भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका | इतिहास

 

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भारतीय इतिहास • स्वतंत्रता संग्राम

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीय कांग्रेस की भूमिका

1885 से 1947 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विकास, प्रमुख आंदोलनों, नेताओं और स्वतंत्रता संघर्ष में उसके योगदान को आसान हिंदी में समझें।

संक्षिप्त परिचय: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर 1885 को हुई थी। शुरुआती दौर में यह राजनीतिक सुधारों और भारतीयों की भागीदारी की मांग करने वाला संगठन था। समय के साथ यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलन का एक प्रमुख राजनीतिक मंच बन गया।

1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और पृष्ठभूमि

उन्नीसवीं शताब्दी में भारत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन था। भारतीयों को प्रशासन में सीमित भागीदारी मिलती थी। आर्थिक शोषण, भेदभाव और राजनीतिक अधिकारों की कमी के कारण शिक्षित भारतीयों में असंतोष बढ़ रहा था।

इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। इसका पहला अधिवेशन 28 दिसंबर 1885 को बंबई (अब मुंबई) के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में हुआ। व्योमेश चंद्र बनर्जी इसके पहले अध्यक्ष बने। पहले अधिवेशन में 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

ए. ओ. ह्यूम सहित कई भारतीय नेताओं ने इसके गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कांग्रेस का शुरुआती उद्देश्य भारतीयों को एक राजनीतिक मंच देना और प्रशासनिक सुधारों के लिए मांग उठाना था।

इतिहास का महत्वपूर्ण तथ्य: कांग्रेस ने शुरुआत से ही तुरंत पूर्ण स्वतंत्रता की मांग नहीं की थी। उसके राजनीतिक उद्देश्यों और कार्यपद्धति में समय के साथ महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।

2. उदारवादी नेताओं का योगदान (1885–1905)

कांग्रेस के शुरुआती चरण को सामान्यतः उदारवादी या नरमपंथी दौर कहा जाता है। इस समय प्रमुख नेताओं में दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले और फिरोजशाह मेहता शामिल थे।

इन नेताओं का विश्वास संवैधानिक तरीकों में था। वे याचिकाओं, सार्वजनिक भाषणों, प्रस्तावों और राजनीतिक संवाद के माध्यम से सुधार की मांग करते थे।

मुख्य मांगें

  • विधायी परिषदों में भारतीयों की अधिक भागीदारी।
  • सरकारी सेवाओं में भारतीयों के लिए अवसर।
  • प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही।
  • आर्थिक नीतियों में भारतीय हितों का ध्यान।
  • भारत और ब्रिटेन में एक साथ सिविल सेवा परीक्षा की मांग।

आर्थिक आलोचना का विकास

दादाभाई नौरोजी ने भारत से धन के बाहर जाने की प्रक्रिया पर चर्चा की। इसे धन निकासी सिद्धांत (Drain Theory) के नाम से जाना जाता है। इस विचार ने औपनिवेशिक शासन के आर्थिक प्रभावों पर सार्वजनिक बहस को मजबूत किया।

इस दौर की एक बड़ी उपलब्धि यह थी कि भारतीय नेताओं ने आर्थिक समस्याओं को राजनीतिक अधिकारों से जोड़ना शुरू किया। हालांकि, शुरुआती कांग्रेस का सामाजिक आधार सीमित था और उसके तरीकों की गति तथा प्रभाव को लेकर बाद में आलोचना हुई।

3. उग्र राष्ट्रवाद और स्वदेशी आंदोलन

बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में कांग्रेस के भीतर अधिक सक्रिय और संघर्षपूर्ण राजनीतिक तरीकों की मांग बढ़ी। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे नेताओं ने राष्ट्रीय चेतना को अधिक व्यापक बनाने में भूमिका निभाई।

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलनों को बल मिला। भारतीयों ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और देशी उत्पादों के इस्तेमाल को राजनीतिक प्रतिरोध के साधन के रूप में अपनाया।

स्वदेशी आंदोलन का महत्व

  • राष्ट्रीय शिक्षा और देशी उद्योगों पर चर्चा बढ़ी।
  • विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को राजनीतिक साधन बनाया गया।
  • छात्रों, महिलाओं और अन्य सामाजिक समूहों की भागीदारी बढ़ी।
  • राष्ट्रवाद को आर्थिक आत्मनिर्भरता के विचार से जोड़ा गया।

1907 में सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के भीतर उदारवादी और उग्रवादी नेताओं के बीच विभाजन हुआ। यह घटना दिखाती है कि स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर रणनीति और नेतृत्व को लेकर मतभेद भी मौजूद थे।

4. गांधीजी का आगमन और कांग्रेस का जन आंदोलन में परिवर्तन

महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उन्होंने सत्याग्रह, अहिंसा और जनभागीदारी पर आधारित संघर्ष की पद्धति को भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।

चंपारण सत्याग्रह (1917), अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) और खेड़ा सत्याग्रह (1918) जैसे आंदोलनों ने स्थानीय समस्याओं को राजनीतिक संघर्ष से जोड़ा।

गांधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने धीरे-धीरे अपने संगठन और कार्यक्रमों को व्यापक जनसमूह तक पहुंचाया। किसानों, श्रमिकों, महिलाओं और विद्यार्थियों की भागीदारी स्वतंत्रता आंदोलन के अलग-अलग चरणों में दिखाई दी।

स्वतंत्रता आंदोलन को समझने के लिए केवल बड़े नेताओं को देखना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय कार्यकर्ताओं, किसानों, महिलाओं, विद्यार्थियों और सामान्य नागरिकों की भागीदारी भी इसके इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

5. असहयोग आंदोलन (1920–1922)

1920 में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग कम करके राजनीतिक दबाव बनाना था। इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और खिलाफत प्रश्न जैसी घटनाएं थीं।

आंदोलन के प्रमुख तरीके

  • सरकारी उपाधियों का त्याग।
  • कुछ सरकारी संस्थाओं और स्कूलों का बहिष्कार।
  • विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को प्रोत्साहन।
  • स्वदेशी और खादी के इस्तेमाल पर जोर।
  • सार्वजनिक सभाओं और जनजागरण के माध्यम से राजनीतिक भागीदारी।

फरवरी 1922 में चौरी चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इस निर्णय को लेकर कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन में बहस हुई। यह घटना अहिंसक संघर्ष की सीमाओं और अनुशासन के प्रश्न को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

6. सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च

1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य घोषित किया। 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया गया।

12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम से दांडी की ओर मार्च शुरू किया। 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर उन्होंने नमक कानून तोड़ा। यह घटना सविनय अवज्ञा आंदोलन का एक प्रसिद्ध प्रतीक बनी।

नमक कानून का विरोध क्यों?

नमक रोजमर्रा के जीवन की आवश्यक वस्तु था। नमक कानून को चुनौती देकर आंदोलन ने एक सामान्य आवश्यकता को औपनिवेशिक शासन के विरोध के व्यापक प्रश्न से जोड़ा।

सविनय अवज्ञा आंदोलन में अलग-अलग क्षेत्रों में कानूनों का उल्लंघन, बहिष्कार और सार्वजनिक प्रतिरोध देखने को मिला। महिलाओं और अन्य सामाजिक समूहों ने भी विभिन्न स्थानों पर भागीदारी की।

7. भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत की राजनीतिक स्थिति जटिल हो गई थी। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं की सहमति के बिना भारत को युद्ध में शामिल किया। राजनीतिक समाधान के प्रयासों के विफल होने के बाद अगस्त 1942 में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया।

8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ। गांधीजी ने ब्रिटिश शासन के अंत की मांग के साथ “करो या मरो” का संदेश दिया।

आंदोलन की विशेषताएं

  • कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को शीघ्र गिरफ्तार कर लिया गया।
  • कई स्थानों पर स्थानीय स्तर पर विरोध और भूमिगत गतिविधियां हुईं।
  • विद्यार्थियों, युवाओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं की भागीदारी रही।
  • ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए।

भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता की मांग को और अधिक स्पष्ट तथा व्यापक बनाने वाली महत्वपूर्ण घटना थी। हालांकि, 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति का कारण केवल एक आंदोलन नहीं था। युद्ध के बाद की आर्थिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का भी प्रभाव था।

8. अन्य नेताओं और संगठनों की भूमिका

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन एक विशाल प्रक्रिया थी। राष्ट्रीय कांग्रेस इसका एक प्रमुख मंच थी, लेकिन स्वतंत्रता संघर्ष में कांग्रेस के बाहर और भीतर अनेक नेता, संगठन तथा सामाजिक समूह सक्रिय रहे।

जवाहरलाल नेहरू

जवाहरलाल नेहरू ने पूर्ण स्वतंत्रता, आधुनिक राष्ट्र निर्माण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसे विषयों पर राजनीतिक बहस को प्रभावित किया। 1929 के लाहौर अधिवेशन में वे कांग्रेस के अध्यक्ष थे।

सरदार वल्लभभाई पटेल

पटेल ने संगठन निर्माण और जन आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खेड़ा और बारडोली जैसे किसान आंदोलनों से उनका नाम जुड़ा है।

सुभाष चंद्र बोस

सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और बाद में आजाद हिंद फौज के नेतृत्व से जुड़े। उनका मार्ग गांधीजी के अहिंसक जन संघर्ष से अलग था। उनके योगदान को स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक इतिहास में अलग संदर्भ के साथ पढ़ना चाहिए।

कांग्रेस से बाहर की भागीदारी

  • क्रांतिकारी संगठनों और कार्यकर्ताओं की गतिविधियां।
  • किसान और श्रमिक आंदोलनों की भूमिका।
  • महिलाओं की सक्रिय भागीदारी।
  • आदिवासी और क्षेत्रीय प्रतिरोध की परंपराएं।
  • मुस्लिम लीग तथा अन्य राजनीतिक संगठनों की गतिविधियां।

स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास किसी एक संगठन या नेता तक सीमित नहीं था। विभिन्न विचारधाराओं और आंदोलनों के बीच सहयोग, मतभेद और प्रतिस्पर्धा मौजूद थी।

9. कांग्रेस का प्रमुख योगदान और सीमाएं

प्रमुख योगदान

  • राष्ट्रीय राजनीतिक मंच: अलग-अलग क्षेत्रों के नेताओं को एक मंच पर लाने में मदद।
  • राजनीतिक चेतना: अधिकारों, प्रतिनिधित्व और स्वशासन के प्रश्नों को सार्वजनिक बहस में लाना।
  • जन भागीदारी: कई चरणों में सामान्य नागरिकों को आंदोलनों से जोड़ना।
  • औपनिवेशिक नीतियों की आलोचना: आर्थिक और प्रशासनिक समस्याओं को राजनीतिक मुद्दा बनाना।
  • स्वतंत्रता की मांग: समय के साथ सुधारों की मांग से पूर्ण स्वराज्य की मांग तक पहुंचना।

ऐतिहासिक सीमाएं और आलोचनाएं

कांग्रेस एक विविध राजनीतिक संगठन थी। उसमें विचारधारात्मक मतभेद, नेतृत्व संघर्ष और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्न मौजूद थे। शुरुआती वर्षों में इसका आधार मुख्यतः शिक्षित और शहरी वर्गों में अधिक था।

इतिहासकार यह भी चर्चा करते हैं कि कांग्रेस की रणनीतियों, नेतृत्व के निर्णयों और विभिन्न समुदायों के साथ संबंधों का स्वतंत्रता संघर्ष पर क्या प्रभाव पड़ा। इसलिए कांग्रेस की भूमिका का मूल्यांकन करते समय उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों और अलग-अलग दृष्टिकोणों को देखना उपयोगी है।

10. स्वतंत्रता, विभाजन और 1947 की घटनाएं

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी थीं। भारत में स्वतंत्रता की मांग, राजनीतिक गतिरोध और विभिन्न संगठनों के बीच मतभेद महत्वपूर्ण बने रहे।

1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया। स्वतंत्रता और सत्ता हस्तांतरण से जुड़े समाधान पर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार के बीच चर्चा हुई। राजनीतिक सहमति कायम नहीं हो सकी।

18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित हुआ। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के साथ भारत का विभाजन भी हुआ, जिससे बड़े पैमाने पर विस्थापन और सांप्रदायिक हिंसा की त्रासदी सामने आई।

महत्वपूर्ण समझ: स्वतंत्रता प्राप्ति को केवल कांग्रेस की गतिविधियों का परिणाम बताना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देगा। जन आंदोलनों, अन्य राजनीतिक संगठनों, क्रांतिकारी गतिविधियों, युद्धोत्तर परिस्थितियों और ब्रिटिश शासन की बदलती स्थिति सहित कई कारकों का अध्ययन जरूरी है।

11. मेरे विश्लेषण से इतिहास की सीख

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अध्ययन हमें बताता है कि बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन लंबे समय में विकसित होते हैं। राजनीतिक संगठन, सार्वजनिक संवाद, जनभागीदारी और अलग-अलग विचारों के बीच बहस इतिहास की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।

कांग्रेस के इतिहास को समझते समय केवल उपलब्धियों को याद करना पर्याप्त नहीं है। उसके निर्णयों, रणनीतियों, सीमाओं और दूसरे संगठनों के योगदान को भी पढ़ना चाहिए। इससे इतिहास अधिक संतुलित और वास्तविक रूप में समझ आता है।

विद्यार्थियों के लिए उपयोगी अध्ययन तरीका

  • पहले 1885 से 1947 तक की समयरेखा याद करें।
  • हर आंदोलन के कारण, उद्देश्य, कार्यक्रम और परिणाम लिखें।
  • गांधीजी, नेहरू, पटेल, तिलक और बोस की भूमिकाओं की तुलना करें।
  • कांग्रेस और अन्य संगठनों की भूमिका को अलग-अलग समझें।
  • परीक्षा के लिए घटनाओं के साथ उनके ऐतिहासिक महत्व को भी पढ़ें।
व्यक्तिगत अध्ययन सलाह: अगर आप इस विषय को पहली बार पढ़ रहे हैं, तो पहले प्रमुख वर्षों की सूची बनाएं। इसके बाद हर घटना को तीन प्रश्नों से समझें: ऐसा क्यों हुआ? इसमें कौन शामिल था? इसका क्या परिणाम निकला?

12. कॉम्पैक्ट अध्ययन डिसीजन ट्री

नीचे दिया गया छोटा डिसीजन ट्री आपको किसी भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रश्न को समझने में मदद करेगा।

प्रश्न: कांग्रेस के किसी आंदोलन को कैसे पढ़ें?
  1. क्या वर्ष और घटना पता है?
    हां → अगला चरण।
    नहीं → पहले समयरेखा देखें।
  2. क्या कारण समझ में आया?
    हां → आंदोलन के उद्देश्य पढ़ें।
    नहीं → घटना की पृष्ठभूमि और ब्रिटिश नीति पढ़ें।
  3. क्या कार्यक्रम और नेतृत्व स्पष्ट है?
    हां → परिणाम और सीमाओं का अध्ययन करें।
    नहीं → प्रमुख नेताओं और भागीदारी के बारे में पढ़ें।
  4. क्या परिणाम समझ लिया?
    हां → दूसरे आंदोलनों से तुलना करें।
    नहीं → विश्वसनीय इतिहास स्रोत से दोबारा जांच करें।

13. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब हुई?

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर 1885 को बंबई में हुई थी। इसके पहले अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी थे।

कांग्रेस के शुरुआती नेताओं का मुख्य तरीका क्या था?

शुरुआती उदारवादी नेता याचिकाओं, प्रस्तावों, राजनीतिक संवाद और संवैधानिक सुधारों के माध्यम से भारतीय अधिकारों की मांग करते थे।

कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य कब लक्ष्य बनाया?

दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य को कांग्रेस के लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन कब शुरू हुआ?

भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान अगस्त 1942 में हुआ। 8 अगस्त 1942 को बंबई में प्रस्ताव पारित किया गया।

क्या केवल कांग्रेस ने भारत को स्वतंत्रता दिलाई?

कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रमुख राजनीतिक संगठन था। लेकिन स्वतंत्रता का इतिहास अनेक नेताओं, संगठनों, जन आंदोलनों और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है।

14. विश्वसनीय बाहरी स्रोत

आगे पढ़ने और ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि करने के लिए नीचे दिए गए स्रोतों का उपयोग करें।

📖 इतिहास से सीखें, समझ के साथ आगे बढ़ें

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अध्ययन केवल परीक्षा की तैयारी नहीं है। यह हमें राजनीतिक अधिकारों, नागरिक भागीदारी और समाज में होने वाले बड़े बदलावों को समझने का अवसर देता है।

इस लेख को विद्यार्थियों और इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों के साथ साझा करें। अलग-अलग स्रोतों को पढ़ें और ऐतिहासिक घटनाओं को उनके संदर्भ में समझें।

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डिस्क्लेमर: यह लेख शैक्षणिक जानकारी के लिए है। इतिहास के कुछ विषयों की व्याख्या अलग-अलग इतिहासकारों और स्रोतों में अलग हो सकती है। परीक्षा या शोध के लिए पाठ्यपुस्तक तथा विश्वसनीय प्राथमिक स्रोतों से तथ्यों की पुष्टि करें।

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